मँहगाई दर क्या होती है |What is Inflation Rate of India

महंगाई दर जिसे हम मुद्रास्फीति दर के नाम से भी जानते हैं किसी भी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था और लोगों पर इसके प्रभाव को स्पष्ट रूप से दर्शाता है| तो चलिए इस ब्लॉग में हम आपको बताते हैं मँहगाई दर क्या होती है |What is Inflation Rate of India

नमस्कार दोस्तों!!!

मैं राज आपका हार्दिक स्वागत करता हूं मेरे इस नए ब्लॉग पोस्ट पर और उम्मीद करता हूं कि महंगाई दर के बारे मे आपको सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त होगी |

मुद्रास्फीति दर होती क्या है :–

मुद्रास्फीति वह दर है जिस पर वस्तुओं और सेवाओं के लिए कीमतों का सामान्य स्तर बढ़ रहा है और फलस्वरूप, मुद्रा की क्रय शक्ति गिर रही है। यदि वस्तुओं की कीमतों के साथ-साथ आय में वृद्धि नहीं होती है, तो सभी की क्रय शक्ति प्रभावी रूप से कम हो गई है, जो बदले में धीमी या स्थिर अर्थव्यवस्था का कारण बन सकती है।

स्फीति का मतलब क्या होता है?

जब सभी वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि हो तो व्यापक स्फीति होती है और जब कुछ विशेष वस्तुओं की कीमतों में ही वृद्धि हो तो खण्डीय स्फीति की स्थिति होती है ।

इन्फ्लेशन का क्या कारण है?

मुद्रास्फीति के कारण (Reason of Inflation)
मुद्रास्फीति के कारण को हम दो भागों में बाँट सकते है जो निम्नलिखित है:-

1. चलन की मात्रा में वृद्धि ::Increase in the volume of currency

प्रत्येक कुछ देश में चलन की मात्रा देश में उपलब्ध वस्तुओं एवं सेवाओं के मूल्य के बराबर या उससे अधिक रखी जाती है। अत: जब किन्हीं विशेष कारणों से चलन की यह मात्रा, वस्तुओं एवं सेवाओं की मात्रा की तुलना में दोगुनी, तिगुनी या और अधिक हो जाती है तो देश में मुद्रास्फीति की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। नीचे लिखे कारण इसी प्रकार के हैं जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से वास्तविक एवं साख-मुद्रा की मात्रा में वृद्धि करके देश में चलन की मात्रा को बढ़ा लेते हैं। जिससे मुद्रास्फीति की स्थिति आ जाती है।


(i) मुद्रा-धातु की पूर्ति में वृद्धि ::–

मुद्रा के धातुओं की पूर्ति बढ़ जाने पर मुद्रास्फीति उत्पन्न हो जाता है क्योंकि धातु की पूर्ति बढ़ने पर देश में मुद्रा की मात्रा सरलता से बढ़ा ली जाती है। यदि किसी देश में स्वर्ण या रजत-मान अपनाया जा रहा है और अचानक उस देश में स्वर्ण या रजत की नवीन खानों का पता लग जाता है तो स्वाभाविक रुप से इन खानों से प्राप्त सोने या चाँदी का प्रयोग देश में मुद्रा विस्तार में किया जायेगा और उस देश में मुद्रास्फीति की स्थिति उत्पन्न हो जायगी।

(ii) मुद्रा एवं साख का ऐच्छिक दृष्टि:‐

विशिष्ट परिस्थितियों में सरकार स्वयं जानबूझकर चलन की मात्रा बढ़ा देती है जिसके फलस्वरुप मुद्रास्फीति की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। आवश्यकता होने पर चलन वृद्धि को सरकार अपनी नीति का एक अंग बना लेती है। सरकार किसी भी समय इस प्रकार की वृद्धि कर सकती है, पर साधारणतया वह ऐसा उस समय करती है जबकि, मुद्रा की क्रय शक्ति को घटाकर ऋणी वर्ग (Debitors) के ऋण-भार में कमी करना हो, युद्ध के कारण उसे अधिक मात्रा में धन की आवश्यकता हो आदि।

(iii) हीनार्थ प्रबन्ध :–

सरकार की हीनार्थ प्रबन्ध नीति के फलस्वरुप भी चलन में मुद्रा की मात्रा बढ़ जाती है जिससे मुद्रास्फीति को प्रोत्साहन मिलता है। हीनार्थ प्रबन्ध की नीति सरकार उस समय अपनाती है जब उसकी आय, व्यय से कम हो। व्यय की अतिरिक्त रकम की पूर्ति के लिए सरकार या तो प्रत्यक्ष रुप से मुद्रा की मात्रा बढ़ा सकती है या फिर प्रतिभूतियों के आधार पर बैंकों से ऋण ले सकती है एवं बैंक इन प्रतिभूतियों के आधार पर साख एवं मुद्रा की मात्रा बढ़ा सकते हैं।

(iv) बैंक जमाओं के वेग में वृद्धि :–

वर्तमान समय में मुद्रास्फीति की स्थिति के लिए यही कारण प्रथम स्थान प्राप्त करता जा रहा है। बैंक जमाओं के वेग में वृद्धि हो जाने के कारण चलन में मुद्रा की मात्रा काफी बढ़ जाती है जिसके फलस्वरुप कीमतों में वृद्धि होने लगती है। कीमतों में वृद्धि मुद्रास्फीति को उत्पन्न कर देती है। बैंक जमाओं का यह विकास boom-period में अत्यधिक बढ़ जाता है।

2. उत्पादन में कमी ::Decrease in production::

जिस प्रकार चलन को बढ़ने पर मुद्रास्फीति उत्पन्न हो जाता है उसी प्रकार यदि चलन की मात्रा यथा स्थिर रहने पर देश में उत्पादन की मात्रा एकदम घट जाय तब भी मुद्रास्फीति की स्थिति उत्पन्न हो जायगी। इसके अतिरिक्त अन्य कारणों से भी उत्पादन में कमी हो सकती है

(i) उत्पादन साधनों की दुर्लभता ::–

देश में श्रम, पूँजी, भूमि, साहस की दुर्लभता होने पर उत्पादन की मात्रा नहीं बढ़ाई जा सकेगी क्योंकि इस स्थिति में उत्पादन उत्पत्ति ह्रास नियम (law of diminishing return) के अन्तर्गत होता है।

(ii) औद्योगिक अस्थिरता :‐

यदि देश में शांति या अस्थिरता नहीं रहती है एवं श्रमिक संघर्ष निरंतर होते रहते हैं तब भी उत्पादन में कमी हो जाती है।

मुद्रास्फीति की गणना कौन करता है?

भारत में, सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय मुद्रास्फीति को मापता है।

मुद्रास्फीति दर निकालने का फार्मूला :–

इन्फ्लेशन रेट की गणना करने का यह फॉर्मूला है:

मुद्रास्फीति दर = (वर्तमान अवधि में प्राइस इंडेक्स – पिछली अवधि में प्राइस इंडेक्स) / पिछली अवधि में प्राइस इंडेक्स) x 100

मुद्रास्फीति के प्रकार :–

मुद्रास्फीति मुख्य 06 प्रकार की है जिसका वर्णन नीचे दिया गया है:-

1. मांग-पुल महंगाई: यह प्रकार मुख्य रूप से तब होता है जब आपूर्ति से संबंधित अर्थव्यवस्था में सेवाओं और वस्तुओं की अत्यधिक मांग होती है| जब मांग अधिक होती हो, तो उत्पादक कीमतों को बढ़ा सकते हैं, जिससे सामान्य कीमत स्तर बढ़ सकता है. यह आर्थिक विकास से जुड़ा होता है और जिसे कम बेरोजगारी दरों, और आर्थिक नीति से चलाया जा सकता है|

2. लागत-पुश महंगाई: यह उत्पादन लागत में वृद्धि के साथ होता है जिससे सामान्य कीमत के स्तर में वृद्धि होती है. बढ़ती मजदूरी, उच्च इनपुट लागत, या सप्लाई चेन में बाधाएं इसका कारण बन सकती हैं. लागत-पुश मुद्रास्फीति से आउटपुट और रोजगार कम हो जाता है क्योंकि फर्म उच्च लागत को पूरा करने के लिए उत्पादन को कम करते हैं.

3. हाइपरिन्फ्लेशन: यह तब होता है जब मुद्रास्फीति दरें अत्यधिक उच्च स्तर तक बढ़ती हैं, आमतौर पर प्रति माह 50% से अधिक होती हैं. अधिक मुद्रास्फीति अक्सर आर्थिक संकट से जुड़ी होती है, जैसे युद्ध या राजनीतिक अस्थिरता, और मुद्रा में लोगों का विश्वास खो देने के कारण आर्थिक प्रणाली के खराब हो जाती है.

4. रिप्रेस्ड इन्फ्लेशन: यह तब होता है जब सरकार महंगाई को कृत्रिम रूप से दबाने के लिए पैसे की सप्लाई को नियंत्रित करती है या मूल्य निर्धारित करती है. हालांकि यह अस्थायी रूप से महंगाई दरों को कम कर सकता है, लेकिन इससे अर्थव्यवस्था में विकृतियां भी हो सकती हैं, जैसे कि माल और सेवाओं की कमी और इन्वेस्टमेंट में कमी. दबाए गए मुद्रास्फीति से भविष्य में अधिक मुद्रास्फीति दरें भी हो सकती हैं, क्योंकि मुद्रास्फीति के मुख्य कारणों को संबोधित नहीं किया जाता है.

5. ओपन इन्फ्लेशन: ओपन इन्फ्लेशन उस स्थिति को दर्शाता है जब ओपन मार्केट में कीमत बढ़ जाती है. इस प्रकार के मार्केट में, शासित या संबंधित अधिकारी मार्केट की कीमतों को नियंत्रित नहीं कर सकते हैं. खुले बाजार उत्पादन कारकों, कीमतों, निर्यात या आयात, उपभोग आदि पर नियंत्रण के बिना मुफ्त बाजार में कार्य करते हैं.

6. अर्ध-महंगाई: ऐसी स्थिति में, कीमतें धीरे-धीरे बढ़ सकती हैं, लेकिन धीरे-धीरे बढ़ सकती हैं, और बढ़ने की दर महत्वपूर्ण आर्थिक व्यवधान या तुरंत पॉलिसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं पड़ सकती है. हालांकि, अर्ध-मुद्रास्फीति की अवधि में भी, खरीदने की क्षमता में कमी और आर्थिक वृद्धि और स्थिरता पर प्रभाव समय के साथ अभी भी महसूस किया जा सकता है|

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मुद्रास्फीति के क्या आर्थिक प्रभाव पड़ते हैं :

मुद्रास्फीति के विभिन्न प्रभावों (आर्थिक प्रभावों) का अध्ययन विभिन्न उप-विभागों के अन्तर्गत निम्नलिखित है

(a) मानव समुदाय पर प्रभाव

मुद्रास्फीति का संपूर्ण मानव समाज पर समान प्रभाव न पड़कर विभिन्न वर्गो पर विभिन्न प्रभाव पड़ता है। मानव समुदाय पर मुद्रास्फीति के प्रभाव को स्पष्ट करने के लिए लार्ड कीन्स ने मानव समुदाय को पाँच वर्गों में बाँटा है। इन्हीं पाँच वर्गो के आधार पर हम मुद्रास्फीति के प्रभाव का अध्ययन करेंगे

1. विनियोगी वर्ग

इस वर्ग में वे समस्त व्यक्ति शामिल होते हैं जो विभिन्न व्यापारों एवं उद्योगों में अपनी पूँजी लगाकर लाभांश के रुप में आय प्राप्त करते हैं, इस वर्ग के दो उप-विभाग हैं। प्रथम वह विनियोगी जो निश्चित आय प्राप्त करते हैं, दूसरे वह विनियोगी जिनकी आय परिवर्तनशील है। प्रथम वर्ग के विनियोगी को मुद्रास्फीति से हानि होती है क्योंकि इनकी आय तो स्थिर रहती है परन्तु मुद्रा की क्रय शक्ति में कमी हो जाने से उस आय की वास्तविक कीमत कम हो जाती है। इसके विपरीत परिवर्तनशील विनियोगी को मुद्रास्फीति से लाभ होता है जिसका कारण यह है कि मूल्य वृद्धि से उद्योगों को अधिक लाभ होता है। अधिक लाभ होने पर इन विनियोगों की आय भी बढ़ जाती है।

2. उत्पादक एवं व्यापारी वर्ग

इस वर्ग के अन्तर्गत हम निम्न प्रकार के लोगों को शामिल कर सकते हैं

(i) साहसी एवं व्यापारी (Entrepreneurs): साहसी निर्माता, थोक विक्रेता एवं फुटकर विक्रेता सभी को मुद्रास्फीति काल में भारी लाभ होता है। इनके लाभ के कई कारण हैं। सर्वप्रथम, ये सभी व्यक्ति उधार लेकर व्यापार करने के कारण ऋणी श्रेणी में आते हैं एवं मूल्य वृद्धि की स्थिति में ऋणी को सदैव लाभ होता है। दूसरे माँगे अधिक हो जाने से वे उत्पादन एवं व्यापार बड़े पैमाने पर करते हैं जिससे उत्पादन लागत एवं व्यापार लागत कम हो जाती है। तीसरे, इनके द्वारा भुगतान की जाने वाली मजदूरी की धनराशि में कीमतों के समान वृद्धि नहीं हो पाती है। संक्षेप में इस श्रेणी के व्यक्ति मुद्रास्फीति से लाभान्वित होते हैं।

(ii) आयात-कर्ता एवं निर्यात कर्ता (Importers and Exporters): मुद्रास्फीति की स्थिति उत्पन्न हो जाने पर देश की मुद्रा का मूल्य कम हो जाता है। जिसके परिणामस्वरूप आयात के लिए आयात-कर्ताओं को अधिक मुद्रा देनी पड़ती है जबकि निर्यात-कर्ता विदेशों को अधिक निर्यात करके लाभ कमाते हैं। निर्यात-कर्ताओं के लाभ में वृद्धि का कारण यह है कि देश में कच्चे माल एवं मजदूरी मे तो मूल्य वृद्धि के अनुपात में वृद्धि नहीं होती है और उन्हें वस्तुओं के निर्यात पर पूर्व दर से ही विदेशी मुद्रा प्राप्त होती रहती है

जिसका विदेशी मुद्रा का ( मूल्य (देश की मुद्रा के मूल्य में कमी होने से) पूर्व की अपेक्षा बढ़ जाता है। इस प्रकार निर्यात कर्ता श्रमिकों एवं उत्पादकों के लाभ को हजम कर जाते हैं। निर्यात-कर्ताओं का यह लाभ उस समय समाप्त हो जाता है जब देश में कच्चे माल के मूल्य में एवं श्रमिक की मजदूरियों में वृद्धि हो जाती है।

(iii) कृषक एवं भू-स्वामी (Agriculturists and Landlords): मुद्रास्फीति की स्थिति में कृषक वर्ग को लाभ होता है क्योंकि उसकी स्थिति ऋणी एवं उत्पादक जैसी होती है। पर इसके विपरीत भूस्वामी को हानि होती है क्योंकि उसका लगान निश्चित होता है। किंतु यह हानि अल्पकालीन होती है क्योंकि भू-स्वामी सर्वशक्ति-सम्पन्न होने के कारण शीघ्र ही लगान बढ़ाने में सफल हो जाते हैं।

3. श्रमिक एवं वेतनभोगी वर्ग :–

इस वर्ग में हम उन समस्त व्यक्तियों को शामिल करते हैं जो दैनिक मजदूरी या मासिक वेतन के आधार पर अपने परिवार की जीविका प्राप्त करते हैं। अत: इस वर्ग के अन्तर्गत सभी प्रकार के वेतन भोगी कर्मचारी (सामान्यतः मध्यम वर्ग) एवं कारखानों, कृषि एवं अन्यान्य कार्यो में लगे श्रमिक (निम्न वर्गीय) शामिल होते हैं। इस संपूर्ण वर्ग को मुद्रास्फीति काल में भारी संकटों का सामना करना पड़ता है क्योंकि इस वर्ग की मजदूरियों एवं वेतनों में मूल्य वृद्धि के अनुपात में वृद्धि नहीं हो पाती है। वेतन एवं मजदूरियों में वृद्धि न होने के कारण इस वर्ग की क्रय शक्ति बहुत कम हो जाती है। फलत: इनके परिवार का भरण-पोषण भी ठीक प्रकार से नहीं हो पाता।

मध्यमवर्ग, जो वर्तमान प्रजातंत्र की रीढ़ की हड्डी के समान है, यही मुद्रास्फीति का बुरी तरह शिकार होता है। मुद्रास्फीति प्रारम्भ से ही इस वर्ग की स्थिति को चौपट करने लगता है। प्रथम विश्व युद्ध के बाद जर्मनी, ऑस्ट्रिया, पोलैंड एवं फ्रांस के मध्यमवर्गीय परिवार इन देशों में फैले गम्भीरतम (hyper) मुद्रास्फीति के कारण पूर्णरुप से बर्बाद हो गये। इस समय इन दोनों के प्रतिष्ठित मध्यवर्गीय परिवार भी पूर्णतया नष्ट हो गये क्योंकि मुद्रास्फीति के कारण इन परिवारों की समस्त बचत एवं विनियोग शक्ति शून्य में बदल गयी।

4. उपभोक्ता वर्ग:–

समाज के सभी सदस्य उपभोक्ता होते हैं एवं उपभोक्ता के रुप में संपूर्ण मानव समाज के लिए मुद्रास्फीति हानिप्रद होता है। इसका एकमात्र कारण यह है कि इनकी आय तो समान रहती है या जरा-सी बढ़ जाती है पर मूल्यों में अत्यधिक वृद्धि हो जाती है। फलस्वरुप वह अपनी आय से पूर्व की अपेक्षा कम वस्तुएँ खरीद पाते हैं। मुद्रा की क्रय शक्ति कम हो जाने के कारण उन्हें अपने उपभोग की मात्रा में कमी करनी पड़ती है जिससे उन्हें स्वाभाविक कष्ट होता है। द्वितीय विश्व युद्ध के समय एवं युद्ध समाप्ति के बाद के काल में मुद्रास्फीति के कारण उत्पन्न उपभोक्ताओं के कष्टों से सभी परिचित हैं। भारत में तो यह अभी तक विद्यमान है।

5. ऋणी एवं धनी वर्ग :–

मुद्रास्फीति की स्थिति में ऋणी वर्ग को लाभ होता है पर धनी वर्ग हानि में रहता है। मुद्रास्फीति के कारण मुद्रा का मूल्य कम हो जाता है अतः ऋण के बदले में पूर्व की अपेक्षा कम क्रय-शक्ति अदा करता है। फलस्वरुप वह मुद्रास्फीति से लाभान्वित होता है। परन्तु धनी को उसके द्वारा दिये गये ऋण के बदले में कम क्रय शक्ति प्राप्त होती है अत: वह हानि में रहता है।

(ब) सरकार एवं करदाताओं पर प्रभाव (Effects on Government and Taxpayers):

मुद्रास्फीति का सरकार एवं करदाताओं पर भी प्रभाव पड़ता है। मुद्रास्फीति के कारण सरकार के खर्चे निरंतर बढ़ते जाते हैं जिसके कारण उस पर अतिरिक्त भार आ पड़ता है। इन ख़र्चों की पूर्ति के लिए सरकार को अतिरिक्त आय की आवश्यकता होती है। परन्तु जनता के रहन-सहन का व्यय बढ़ जाने के कारण एवं आय में वृद्धि होने के कारण करारोपण की वृद्धि का वह निरंतर विरोध करती है। बाध्य होकर सरकार को बढ़े हुए ख़र्चों की पूर्ति के लिए मुद्रास्फीति को बढ़ावा देना पड़ता है और वह अधिक निर्गमन द्वारा इन ख़र्चों की पूर्ति तब तक करती रहती है जब तक की स्थिति निकृष्टतम नहीं हो जाती।

इस प्रकार सरकार को भी मुद्रास्फीति की स्थिति से हानि ही होती है। पर इसके विपरीत कर-दाताओं को इस स्थिति से लाभ होता है। क्योंकि उन्हें कर के रुप में यद्यपि पूर्व से अधिक रकम देनी पड़ती है पर क्रयशक्ति की दृष्टि से यह रकम पूर्व की अपेक्षा बहुत कम होती है।

भारत का inflation Rate पिछले 15 सालों में :–
मँहगाई दर क्या होती है |What is  Inflation Rate of India
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